केदारनाथ के ऐतिहासिक होने का प्रमाण (Proof of Ancient Kedarnath History)


आस्था के प्रतीक केदारनाथ मंदिर के कुछ महत्वपूर्ण राज पहली बार उजागर हो पाए हैं। हालही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को मंदिर के ११ -१२वीं सदी के प्रमाण मिले हैं।

केदारनाथ मंदिर की दीवारों पर गोदे गए अक्षरों (पुरालेखों) के अध्ययन के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है। मंदिर की दीवारों पर प्रारंभिक नागरी व नागरी में लिखे अक्षर मिले, जो ११ -१२वीं सदी में ही लिखे जाते थे।

जून २०१३ की आपदा में केदारनाथ मंदिर के भीतर जमकर मलबा भर गया था। एएसआइ को मलबे की सफाई के दौरान मंदिर की दीवारों पर जगह-जगह अक्षर (पुरालेख) गुदे हुए मिले, जिनके अध्ययन के लिए मैसूर से विभाग की इफिग्राफी ब्रांच के विशेषज्ञ बुलाए गए थे।

इफिग्राफी ब्रांच के निदेशक डॉ. रविशंकर की ओर से अध्ययन रिपोर्ट पूरी कर विभाग के महानिदेशक व क्षेत्रीय कार्यालय, देहरादून को भेजी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरालेख प्रारंभिक नागरी व नागरी में दर्ज हैं, जिससे माना जा सकता है कि मंदिर ११ -१२वीं सदी में अस्तित्व में आया।

विशेषज्ञों ने चिंता भी जाहिर की कि पुरालेखों में किसी तारीख का उल्लेख नहीं मिला। न ही किसी राजवंश का नाम दीवारों में दर्ज पाया गया। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी पता चला कि पुरालेख मंदिर में आने श्रद्धालुओं या आमजन के थे। इनकी लिखावट आड़ी-तिरछी पाई गई, क्योंकि किसी राजा या खास पुरालेख में बनावट आदि का विशेष ख्याल रखा जाता था। पुरालेखों में दान देने, भगवान को नमन करने व मंदिर तक सकुशल पहुंचने आदि का जिक्र मिला।

मंदिर की दीवारों पर गोदे गए अक्षरों के अध्ययन के बाद इपिग्राफी (पुरालेख) विशेषज्ञों ने निकाला निष्कर्ष निकाला कि प्रारंभिक नागरी व नागरी ये अक्षर (पुरालेख) टंकित किए गए हैं।

बेहद खराब हो चुके हैं पुरालेख रिपोर्ट में इपिग्राफी विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की कि पुरालेखों की दशा रखरखाव के अभाव व मौसम की विषम परिस्थितियों के चलते बेहद खराब स्थिति में पहुंच गई है।

नियंत्रण के अभाव में दीवारों पर कुछ जगह पुरालेख एक दूसरे के ऊपर भी दर्ज हैं। जिससे ऐसे अक्षरों को पढ़ पाना संभव नहीं हो पाया।

अब तक मंदिर निर्माण की मान्यताएं-एक मान्यता के अनुसार केदारनाथ मंदिर को आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने बनाया। जबकि राहुल सांकृत्यायन लिखित अभिलेखों में मंदिर को १२ -१३वीं शताब्दी का बताया गया।

वहीं, ग्वालियर में मिली एक राज भोज स्तुति में मंदिर को १०७६ -९९ काल का माना गया। पांडव या उनके वंशज जन्मेजय के समय भी मंदिर निर्माण की बात सामने आती है।