नागाओ का रहस्य (Secret of Nagas naga saints)

कुंभ मेले के कवरेज में आपने कई बार देखा होगा कि नागा बाबा कपड़े नहीं पहनते हैं और पूरे शरीर पर राख लपेटकर घूमते हैं। उन्‍हे किसी की कोई शर्म या हया नहीं होती है वो उसी रूप में मस्‍त रहते हैं।
नागा साधु हिन्दू धर्मावलम्बी साधु हैं जो कि नग्न रहने तथा युद्ध कला में माहिर होने के लिये प्रसिद्ध हैं। ये विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं जिनकी परम्परा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गयी थी।
1. नागा शब्‍द का अर्थ ही होता है नंगा। ये साधु पूरी तरह नग्‍न अवस्‍था में रहते हैं और यही इनकी पहचान है। वे स्‍वयं को ईश्‍वर का देवदूत मानते हैं और उनकी उपासना में खुद को लीन कर लेते हैं कि उन्‍हे कपड़ों से कोई मतलब नहीं होता है।
2. नागा साधु बनने के लिए लग जाते हैं 12 वर्ष। नागा पंथ में शामिल होने के लिए जरूरी जानकारी हासिल करने में छह साल लगते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुंभ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर यूं ही रहते हैं।
3. ये समुदाय को ही अपना परिवार मानते हैं। इनके लिए सांसारिक परिवार मायने नहीं रखता है।
4. ये लोग कुटिया बनाकर साधु जीवन व्‍यतीत करते हैं। इनका कोई विशेष स्‍थान या घर नहीं होता है।
5. ये तीर्थयात्रियों द्वारा दिए जाने वाले भोजन को ही ग्रहण करते हैं। इनके लिए दैनिक भोजन का कोई महत्‍व नहीं होता है।
6. इनका मानना है कि कपड़े, तन ढ़कने का काम करते हैं जिन्‍हे तन की सुरक्षा करनी हो, वही इसे पहनें। हम नागा बाबा हैं हमारे लिए कपड़ों का कोई महत्‍व नहीं होता है।
7. नागा बाबा हर समय ध्‍यान में लीन रहते हैं। इनके विचार दृढ़ होते हैं। इनको मौसम आदि का कोई फर्क नहीं पड़ता है।
8. सबसे पहले वेद व्यास ने संगठित रूप से वनवासी संन्यासी परंपरा शुरू की। उनके बाद शुकदेव ने, फिर अनेक ऋषि और
9. संतों ने इस परंपरा को अपने-अपने तरीके से नया आकार दिया। बाद में शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर दसनामी
10. संप्रदाय का गठन किया। बाद में अखाड़ों की परंपरा शुरू हुई। पहला अखाड़ा अखंड आह्वान अखाड़ा' सन् 547 ई. में बना।

संतों के तेरह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं:- ये हैं जूना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।
नागा साधुओं को सबसे पहले ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जाती है। इस परीक्षा को पास करने के बाद महापुरुष दीक्षा होती है। बाद की परीक्षा खुद के यज्ञोपवीत और पिंडदान की होती है जिसे बिजवान कहा जाता है।